बिहार और अमेरिका चुनाव के शोरगुल के बीच शिवराज सिंह ने बचा ली अपनी कुर्सी

राष्ट्रीय पटल पर चर्चा से दूर रहा मध्‍य प्रदेश उप-चुनाव। मीडिया में इन्हें ज्यादा स्पेस नहीं मिला, जबकि राज्य में सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं थीं।  

विनोद पाठक। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की सरकार बच गई। उप चुनावों में भाजपा ने 28 सीटों में से 19 जीत लीं, जबकि सरकार बचाने के लिए उसे 9 सीटों की ही जरूरत थी। कांग्रेस को 9 सीटों पर सफलता मिली। हालांकि, अमेरिका और बिहार चुनाव की चर्चाओं के बीच मध्य प्रदेश के उप चुनाव दबकर रह गए। मीडिया में इन्हें ज्यादा स्पेस नहीं मिला, जबकि राज्य में सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं थीं।

दिसंबर 2018 में जब मध्य प्रदेश में चुनाव हुए थे, तब कांग्रेस ने 114 सीटें जीती थीं। भाजपा को 109 सीटें मिली थीं। अन्य के खाते में 7 सीटें गईं थीं। राज्य में बहुमत के लिए 116 सीटों चाहिए। मुख्यमंत्री पद के दावेदार कांग्रेस के दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया थे, लेकिन कुर्सी पर बैठ कमलनाथ गए थे। तभी से सिंधिया नाखुश चल रहे थे। कमलनाथ सरकार को चलते हुए 14 महीने ही बीते थे कि सिंधिया ने बगावत कर दी। उन्होंने न केवल भाजपा का दामन थामा, बल्कि अपने समर्थक 22 विधायकों के इस्तीफे दिलवा दिए।

इस्तीफों से विधानसभा का समीकरण बदल गया। भाजपा के 107 और कांग्रेस के 87 विधायक रह गए। विधायकों के इस्तीफों से सदन की संख्या भी घटकर 201 रह गई और बहुमत से शिवराज सिंह चौहान 14 महीने बाद पुनः मुख्यमंत्री बन गए। कुर्सी पर बैठते हुए शिवराज की चुनौतियां शुरू हो गईं। उनकी राह आसान नहीं थी। कोरोना महामारी के कारण उप चुनाव टलते चले गए। आखिरकार चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनाव के साथ इन्हें कराने की घोषणा की।

चूंकि बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी, सो 28 सीटों के मध्य प्रदेश के उप चुनावों की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर बेहद सीमित होकर रह गई। बिहार से पहले अमेरिकी चुनावों के शोर ने भी मध्य प्रदेश उप चुनावों की चमक को मंद ही किया। सरकार दांव पर लगी होने के बावजूद भाजपा या कांग्रेस के दिग्गज नेता मध्य प्रदेश नहीं आए, वरना 28 सीटों पर चुनाव कोई छोटा चुनाव नहीं होता। गोवा, दिल्ली या उत्तर-पूर्व के राज्यों में तो इतनी सीटों से आधी विधानसभा भर जाती हैं।

कुर्सी भले शिवराज सिंह चौहान की बचनी थी, लेकिन उप चुनावों में असली प्रतिष्ठा ज्योतिरादित्य सिंधिया की ही दांव पर लगी थी। नतीजों को देखें तो भाजपा ने 49.5 प्रतिशत वोट हासिल करके 19 सीटें जीतीं। कांग्रेस को 9 सीटें मिलीं और उसे 40.5 प्रतिशत वोट मिले। 2018 में 2 सीटें जीतने वाली बहुजन समाज पार्टी ने भी 5.75 प्रतिशत वोट हासिल किए। हालांकि, उसे किसी सीट पर जीत नहीं मिली। कई सीटों पर कड़ी टक्कर देखने को मिली।

भांडेर सीट पर तो भाजपा प्रत्याशी ने कांग्रेस उम्मीदवार को मात्र 161 वोटों से हराया। आगर में कांग्रेस 1998 वोटों से जीत पाई। शिवराज सिंह चौहान की कैबिनेट के तीन मंत्री इमरती देवी, गिर्राज दंडोतिया और रघुराज कंसाना को हार का मुंह देखना पड़ा। सिंधिया के लिए यह सुखद रहा कि उनके 19 में से 13 लोग जीत गए। हालांकि, सिंधिया गुट को छोड़ दें तो भाजपा 107 से 113 हो गई है। बसपा के दो विधायक और एक निर्दलीय उसके पक्ष में हैं। उप चुनाव से ठीक पहले एक और कांग्रेस विधायक के इस्तीफे से सदन की संख्या 229 है, ऐसे में बिना सिंधिया गुट के भी भाजपा बहुमत में है।

मध्य प्रदेश उप चुनावों को अमेरिका और बिहार चुनाव के साथ एक फ्रेम में देखा जा सकता है। एक तरफ अमेरिकी चुनावों ने द्विध्रुवी विचारधाराओं को मजबूत करने और समाज के विभाजन में योगदान दिया तो बिहार चुनाव में थोड़ी नवीनता यह रही कि मतदाताओं ने राजनीतिक दलों को कड़ा संदेश दिया। नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली राजद को तेजस्वी यादव की अगुवाई वाले महागठबंधन ने कड़ी टक्कर दी। मुकाबला बेहद करीबी क्रिकेट के टी-20 मैच वाले अंदाज में रहा। कुछ ऐसा ही अमेरिका में भी चल रहा है।

उप चुनावों में शिवराज सिंह चौहान के समक्ष पांच चुनौतियां स्पष्ट रूप से देखी गईं। एक – कहने को भले ही उप चुनाव थे, लेकिन हार-जीत से सत्ता परिवर्तन भी संभव था, इसलिए इसको हल्के में कतई नहीं लिया जा सकता था। दो – कांग्रेस से भाजपा में आए नेताओं और उनके कार्यकर्ताओं को साथ रखना चुनौतीपूर्ण रहा। तीन – कांग्रेस से भाजपा में आए नेताओं और भाजपा के नेताओं के बीच सामंजस्य स्थापित करना आसान नहीं रहा। चार – टिकट वितरण में जिन भाजपा के नेताओं को टिकट नहीं मिल पाया उनमें भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर उनके नेटवर्क का चुनावों में लाभ लेना कठिन कार्य था। पांच – भाजपा वैसे तो संगठनात्मक अनुशासन की एकता के लिए जानी जाती है, लेकिन इस उप चुनाव में भाजपा का स्वरूप कई क्षत्रपों वाली कांग्रेस जैसा प्रतीत हो रहा था।

एक बात और गौर करने वाली यह भी है कि इस उप चुनाव में भाजपा की ओर से जीतने वाले प्रत्याशियों के जीत का अंतर 2018 विधानसभा चुनाव से भी अधिक था, जो इस बात का इशारा करते हैं कि शिवराज सिंह चौहान ने न सिर्फ अपने वोटों पर पकड़ बनाई हुई है, बल्कि कांग्रेस पार्टी के वोटों को भी काफी हद तक भाजपा की ओर लाने में सफल हुए हैं और पुराने कांग्रेसियों को भाजपा की विचारधारा से जोड़ा है। उप चुनावों के स्पष्ट नतीजों से यह साफ हो गया है कि आगामी तीन साल शिवराज सिंह चौहान कुर्सी पर बने रहेंगे, लेकिन उनकी राह आसान बिल्कुल नहीं होगी। उन्हें आगे भी सिंधिया गुट के विधायकों के साथ समन्वय बनाए रखना होगा। अपनी पार्टी के नेताओं को साधकर रखना भी चुनौती होगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!