Home लीगल अब अखबार नहीं छाप सकेंगे संदिग्ध आरोपियों के फोटो, हाईकोर्ट का आदेश

अब अखबार नहीं छाप सकेंगे संदिग्ध आरोपियों के फोटो, हाईकोर्ट का आदेश

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मीडिया को कोई भी जानकारी मामले की जांच के दौरान तभी दी जा सकेगी, जब एसपी इसकी स्वीकृति  देंगे। यदि कोई गलती होती है तो इसके लिए एसपी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे।

द ग्वालियर। मध्‍य प्रदेश उच्‍च न्‍यायालय खंडपीठ ग्‍वालियर (Madhya Pradesh High Court Bench Gwalior) ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP Madhya Pradesh) को निर्देश दिए हैं कि वे तत्काल सभी पुलिस अधीक्षकों (Superintendent of Police ) को दिशा-निर्देश जारी करें कि किसी भी परिस्थिति में आरोपी का मीडिया में खुलासा नहीं किया जाएगा। आरोपी के फोटो का प्रकाशन एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर प्रसारण नहीं किया जा सकेगा।

न्यायमूर्ति जी एस अहलूवालिया (Justice GS Ahluwalia) ने अरुण शर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश दिए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्‍ता सुरेश अग्रवाल ने हाईकोर्ट में पैरवी की। हाईकोर्ट ने राज्य शासन (State Government of MP) को यह भी निर्देश दिए कि गवाह सुरक्षा कानून को शीघ्र लागू किया जाए। संदिग्ध आरोपियों की पहचान का खुलासा न्यूज़पेपर या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर करना व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन है। न्यायालय ने कहा कि पुलिस महानिदेशक द्वारा इस संबंध में 2 जनवरी 2014 को एक सर्कुलर जारी किया गया था, जिसमें आरोपी की व्यक्तिगत जानकारी प्रसारित करने पर रोक लगाई गई थी क्योंकि यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।

जनता के बीच नहीं होगी परेड

न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि संदिग्ध आरोपियों की जनता के बीच पुलिस द्वारा जो परेड की जाती है वह भी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। न्यायालय ने कहा कि सस्पेक्टेड की जनता के बीच परेड नहीं होगी। इस संबंध में पुलिस महानिदेशक सभी पुलिस अधीक्षकों को दिशा-निर्देश जारी करें। मीडिया को कोई भी जानकारी मामले की जांच के दौरान तभी दी जा सकेगी, जब एसपी इसकी स्वीकृति  देंगे। यदि कोई गलती होती है तो इसके लिए एसपी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि गवाहों की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है, इसलिए गवाह सुरक्षा कानून को लागू किया जाए।

ग्वालियर एसपी को हाईकोर्ट में हाजिर होकर स्पष्टीकरण देने के निर्देश

हाईकोर्ट ने पुलिस द्वारा याचिकाकर्ता अरुण शर्मा को इनामी बदमाश बताकर गिरफ्तार करने एवं उसके फोटो मीडिया में प्रकाशित कराने के मामले को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना है। इस मामले में एसपी ग्वालियर को समस्त दस्तावेजों के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए हाजिर होने के निर्देश दिए हैं।

याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होने पर उच्च न्यायालय द्वारा याचिकाकर्ता को मुआवजा दिलाए जाने के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता एवं अधिवक्ता को न्यायालय को सुझाव देने का आग्रह किया था। प्रकरण की सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता पुरुषेंद्र कौरव ने इस मामले में शासन को पुनर्विचार के लिए समय दिए जाने का आग्रह किया, जिस पर न्यायालय ने 1 सप्ताह का समय देते हुए प्रकरण की सुनवाई को 9 नवंबर के लिए नियत किया।

 यह है मामला

याचिकाकर्ता द्वारा याचिका थाना प्रभारी सब इंस्पेक्टर एवं एक अन्य पुलिसकर्मी के खिलाफ कार्यवाही की मांग को लेकर प्रस्तुत की गई। याचिकाकर्ता जो कि एक दुकानदार है उस पर यह आरोप है कि वह न तो दुकान खाली कर रहा है और न किराए का भुगतान कर रहा है। वह शेष मकान पर भी अतिक्रमण कर सकता है। यह आरोप लगाते हुए उसे पुलिस के सहयोग से जबरन बाहर निकाला गया। उसके साथ मारपीट की गई दुकान का सामान थाने ले जाया गया। उसे यह तय कराया गया कि वह दुकान को खाली कर देगा। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि पुलिस ने उसे 5000  का इनामी बदमाश बताते हुए अखबारों में उसकी फोटो छपवाकर उसकी प्रतिष्ठा समाप्त की गई। मामले की शिकायत होने पर एसपी द्वारा जब जांच कराई गई तो पाया गया कि याचिकाकर्ता एक निर्दोष व्यक्ति है और उसे रिहा कर दिया गया।

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